बेपर्दा / कल्बे कबीर

पतझड़ फिर आ गया है ।पेड़ों से कल रात उतरे हुए पीले पत्ते सड़कों पर आवारा डोल रहे हैं ।बीत चले बसंत की बेबाक़ हवाएँ आते जाते लोगों की क़मीज़ों में उलझ रहीं हैं । यह जाती हुई शाम है  जब मुझे लगता है कि मैं एक फ़िल्म बनाना चाहता हूँ।
फ़िल्म बनाने की एक धुँधली सी इच्छा बहुत बार मेरे मन में जगी है । बचपन से लेकर अब तक बहुत सारे ऐसे दृश्य मेरी आँखों के सामने गुज़रे हैं जब मुझे लगा है की मुझे फ़िल्म बनानी चाहिए । अपने क़सबे के घर के आँगन में गोबर से लीपे हुए चूल्हे को फूँक मार कर सुलगाती हुई दादी की आँखों से निकलते हुए आँसू, अपने लम्बे कानों को ज़ोर ज़ोर से हिला कर धुएँ को तितर बितर करती हुई काले चाबकों वाली बकरी और चटख चटख करती हुई लकड़ियाँ -ये सब देख कर शायद पहली बार मुझे लगा था की केवल दृश्यों के माध्यम से भी कुछ रचा जा सकता है । यह बहुत पुरानी बात है जब मेरे पिता होर्डिंग्स बनाया करते थे और मुझसे रंगों की पुताई करवाते थे
हमारे घर की छत पर एक कमरा था । कमरे में एक खिड़की थी -मैं उस क़सबे की सुनसान और अकेली दोपहर उसी खिड़की में बैठ कर गली में ताकते हुए काटता था ।उस गली से गुज़रता हुआ अकेला आदमी कितना आदमी नज़र आता था -यह सब देखने की बात थी ।हमारे स्कूल का एक हिंसक मास्टर जिसे देखते ही कंपकंपी छूटती थी, उस गली से गुज़रता हुआ बहुत मानवीय दिखाई देता था -चिंताओं से लदा फंदा एक कमज़ोर आदमी । उस समय गली से गुज़रता हुआ हर आदमी मेरी फ़िल्म का दृश्य हुआ करता था । सामने के मोड़ से मुड़ता हुआ और मेरी खिड़की के नीचे से गुज़रता हुआ । बस उसके बाद मेरी फ़िल्म में उसकी कोई ज़रूरत नहीं रह जाती थी ।
जब मेरी बहन काली धारियों वाली फ़्राक पहन कर सीढ़ियाँ उतरती थी तब मैं सोचता था की फ़िल्म में ये बताना क्यों ज़रूरी है की सीढ़ियाँ उतर कर कहाँ गई हैं किस से बात की है ,क्या लड़की का सीढ़ियाँ उतरना एक पूरा दृश्य नहीं है? चाक्षुष सौंदर्य और मानवीय क्रियाओं से भरा पूरा एक सम्पूर्ण सिक़वेंस।
मैं अब तक कोई भी फ़िल्म नहीं बना पाया। फ़िल्म क्या -तस्वीरें उतारने के लिए आज तक कोई कैमरा तक नहीं ख़रीद पाया ।बहुत पहले एक बार एक बॉक्स कैमरा किराए पर लिया था ,दस बारह तस्वीरें खींची थी ।एक लड़की को चिढ़ाया था, कैमरा दिखा कर -तस्वीर खींच लूँगा तेरी मैं नदी के साथ ।
कभी कभी ये सोच कर घबरा जाता हूँ कि अचानक फ़िल्म बनाने की सुविधाएँ पा गया तो क्या करूँगा ?फ़िल्म बनाने से पहले पाँच दस हज़ार फ़ुट कच्ची फ़िल्म बिगाड़नी चाहिए ।अब तक बिगाड़ देनी चाहिए थी । पहली बार में पाँच सौ फ़ुट में से साढ़े चार सौ फ़ुट फ़िल्म सही निकाल पाना कितना मुश्किल होगा।लेकिन अगर ऐसा हुआ भी तो क्या इस बात का डर तनाव और एक क़िस्म का निजी आतंक भी मेरी रचनात्मकता का हिस्सा नहीं रहेगा ?इस अभाव को भी तो रचनात्मकता में बदला जा सकता है ।
मेरे दोस्त कभी कभार पूछते हैं कि मेरी फ़िल्म का विषय क्या होगा ?मैं उनसे कहता हूँ कि जब कविता या कहानी लिखने के लिए किसी विषय की ज़रूरत नहीं होती ,तो फिर फ़िल्म बनाने के लिए क्यों हो ?
उनका पूछना भी ग़लत नहीं है । दुनिया की हर अच्छी फ़िल्म में से कोई कहानी या विषय निकल ही आएगा हो सकता है फ़िल्म बनाने के बाद मेरी फ़िल्म का विषय भी बताया जा सके ।दोस्त बड़े फ़िल्मकारों का हवाला देकर कहते हैं कि वे पहले फ़िल्म की स्क्रिप्ट तैयार करते हैं ।हर फ़्रेम का रेखांकन कर लेते हैं ,फिर फ़िल्म बनाते हैं । मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगा। इस जाती हुई बीसवीं शताब्दी की भयावह “असुरक्षा”के बीच जीती हुई मानवीयता के बारे में ,इतने सुरक्षित ढंग से फ़िल्म बनाने का क्या अर्थ है ?
हम किसी व्यक्ति या समाज की जीवन गाथा को किसी कहानी में घटाते हुए यह भूल जाते हैं कि जीवन का अधिकतर हिस्सा घटित कहानी के बाहर कर दिया गया है ।धूल धक्कड़ से भरे किसी व्यक्ति के सामने से गुज़रे हुए सौ दो सौ हारे थके अजनबी चेहरों का क्या उसके जीवन में कोई मूल्य नहीं है ? शायद मेरी फ़िल्म में ज़िंदगी के बोझ से दबे ऐसे लोगों के चेहरे हों ।राजस्थान के एक पुराने क़स्बे में बस के इंतज़ार में बैठे हुए मैंने लिखा था:
हिलते डुलते धड़ों पर कत्थई धब्बे
कभी यहाँ चेहरे रहे होंगे ।
ये पंक्तियाँ भी तो मेरी फ़िल्म की स्क्रिप्ट हो सकतीं हैं
जब किसी कविता का शीर्षक “एक कविता” हो सकता है तो किसी फ़िल्म का शीर्षक “एक फ़िल्म” क्यों नहीं हो सकता। प्रेम कविता हो सकती है, प्रेम कहानी हो सकती है तो “प्रेम फ़िल्म “क्यों नहीं हो सकती? कितनी अजीब बात है कि आज तक फ़िल्म को स्वतंत्र कला माध्यम का दर्जा तक नहीं मिल सका । अगर मिल चुका होता तो प्रेम फ़िल्म हो सकती थी, उसे किसी कहानी की बैसाखी की ज़रूरत नहीं पड़ती।
प्रेम से अधिक क्रियात्मक और चाक्षुष कुछ और इस दुनिया में है क्या? मैं एक प्रेम फ़िल्म बनाना चाहता हूँ। इस फ़िल्म में संवाद होंगे लेकिन कहीं कहीं वे आपके कानों तक पहुँचते पहुँचते अस्पष्ट हो जाएँगे । फुसफुसाहट होगी -धुँधले दृश्य होंगे ।हम अपने दृश्य जगत में कितने सारे धुँधले दृश्य देखते हैं ,लेकिन फ़िल्म गेम साफ़ दिखातीं हैं। साफ़ सुथरे लैंड्स्केप,पहचान में आ जाने वाले चेहरे। यह सौंदर्य को नष्ट करना हुआ। इसे “एस्थेट्रिक्स” भी कह सकते हैं । मेरी फ़िल्म में बहुत सारे चेहरे पहचाने जाने से पहले ही दृश्य से बाहर हो जाएँगे -जैसा जीवन में होता है ।

अगर जैसलमेर में फ़िल्म बनाई जा रही हो (जहाँ मैं बनाना चाहूँगा )और अचानक अंधड़ आ जाए ,अंधड़ ना भी आए तो -कैमरे के लेंस पर बालू रेत के कण जम जाएँगे ।मैं उन्हें पोंछना नहीं चाहूँगा ।मैं जब जब भी जैसलमेर गया हूँ ,मेरे चश्मे पर धूल के कण जमे हैं ।मैंने कभी चश्मे को भी नहीं पोंछा-उसी के साथ मैंने जैसलमेर के वास्तु, पसरी हुई रेत, भागते हुए ऊँट और रंगीन ओढ़नों में लिपटी औरतों के सिर पर ख़ाली घड़ों को देखा है । अपनी फ़िल्म में भी इन दृश्यों को ऐसे ही देखना चाहूँगा ।

मेरी फ़िल्म में संवाद होंगे -पर वे दृश्य के साथ साथ भी लिखे जा सकते हैं ।एक जाती हुई शाम में अपने दोस्त की गली में घुसता हुआ व्यक्ति -दोस्त के घर का दरवाज़ा खटखटाता है -आधा दरवाज़ा खुलता है, उसके भीतर से एक औरत झाँकती है, औरत जो कुछ बताती है, उसे सुने बिना भी हम जान सकते हैं ।

मैं नहीं जानता कि दुनिया में “पर्सनल “सिनेमा जैसी कोई चीज़ मौजूद है या नहीं ।अगर है तो निश्चित रूप से यह शैली बहुत मुश्किल होगी ।पूरी फ़िल्म पर एक आदमी का नियंत्रण कठिन तो ज़रूर है,असम्भव नहीं । मैं ऐसी ही एक पर्सनल फ़िल्म बनाना चाहता हूँ।

कल्बे-कबीर हिंदी के सुपरिचित कवि हैं. एक शराबी की सूक्तियां, बाग़-ए-बेदिल, कविता रहस्य जैसी किताबों के लिए इन्हें ख़ास तौर पर जाना जाता है.

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